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क्या योगी जी रोक पाएँगे UP की बढ़ती आबादी?

योगी आदित्यनाथ ने नई जनसंख्या नीति का ऐलान

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने नई जनसंख्या नीति का ऐलान कर दिया है। बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के लिए जो सरकारी नीति बनाई गई है, उसमें एक बच्चे के माता पिता को बड़े फायदों का ऐलान किया गया है, जबकि कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ दो बच्चों वाले माता पिता को मिलेगा लेकिन तीन बच्चों के माता पिता की तो शामत आनी तय है।

क्योंकि नई नीति के मुताबिक तीन या उससे ज्यादा बच्चों के माता पिता अब सांसद और विधायक को छोड़कर कोई चुनाव नहीं लड़ पाएँगे। इतना ही नहीं सस्ता सरकारी राशन भी सिर्फ दो बच्चों और उनके माता पिता को ही मिलेगा।  मतलब ये बाकी बच्चों के लिए गुजारे का जुगाड़ उनके माता पिता ही करेंगे। अब पता नहीं कि इस नीति से लोग बच्चे पैदा करना कम करेंगे या फिर आबादी बढ़ने की ये रफ्तार ऐसे ही जारी रहेगी।

इससे कुछ दिन पहले असम के नए मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने बढ़ती आबादी पर काबू करने के लिए जनसंख्या नीति लागू करने का ऐलान किया था। जनसंख्या नीति की घोषणा होते ही असम समेत पूरे देश में चर्चा शुरू हो गई कि क्या वाकई ये नीति आबादी पर लगाम लगाने के लिए बनाई गई है या फिर इसके पीछे कोई सियासी मकसद है।

विरोधी इसके पीछे सीधे सीधे सियासी वजह देखते हैं क्योंकि असम की सीमा  बांग्लादेश और म्यांमार से सटी है और अकसर वहाँ अवैध घुसपैठ होती रहती है। इसमें भी बड़ी बात ये है कि अवैध घुसपैठियों में सबसे बड़ी संख्या मुसलमानों की होती है जो कई बार शरणार्थियों के कैंप से निकल कर देश भर में फैल जाते हैं। मुस्लिम शरणार्थियों की इस घुसपैठ को ही बीजेपी देश के आबादी संतुलन पर बड़ी चोट मानती है। इसके साथ ही आए दिन ऐसे आंकड़े सामने आते रहते हैं जो ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि पिछले 70 साल में देश में मुसलमानों की आबादी बढ़ने की रफ्तार हिन्दुओं, सिखों और ईसाइयों से बहुत ज्यादा रही है।

हिन्दू हित की बात करने वाले आरएसएस और उसके जैसे दूसरे संगठनों के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही है। कभी मुसलमानों की अशिक्षा और गरीबी को उनकी आबादी बढ़ने की वजह बताया जाता है तो कभी कहा जाता है कि मुसलमान एक एजेंडे के तहत भारत में अपनी आबादी बढ़ाने में जुटे हैं। इसी तथाकथित एजेंडे से निपटने के लिए संघ के सियासी संगठन बीजेपी ने अपनी सरकारों को जनसंख्या नीति लाने के लिए प्रेरित किया है।

लेकिन पूरा मामला दो और दो चार की तरह सीधा सादा नहीं है। दरअसल अगले साल यूपी में विधान सभा चुनाव होने हैं और बीजेपी के लिए यूपी पर कब्जा बनाए रखना बहुत जरूरी है। मजे की बात ये है कि भारतीय जनता पार्टी के सामने केवल समाजवादी पार्टी ही छोटे मोटे स्तर पर खड़ी दिखाई देती है। समाजवादी पार्टी खुद को मुसलमानों की हितैषी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। मजे की बात ये है कि अल्पसंख्यक वोटों के चक्कर में केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं है बल्कि बीएसपी भी दलित वोटों के साथ मुसलमानों का समीकरण जोड़ने के जुगाड़ में रहती है उधर कांग्रेस भी खुद को मुसलमानों वोटों का झंडाबरदार घोषित कर चुकी है। इन सबसे बड़ी बात ये है कि इस बार यूपी चुनाव में हैदराबाद के असदुद्दीन ओवैसी भी ताल ठोकने का ऐलान कर चुके हैं। ओवैसी लगातार यूपी के दौरे कर रहे हैं लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस उन्हें बीजेपी की बी पार्टी बताते रहते हैं।

वैसे तो सारे समीकरण योगी जी के पक्ष में नज़र आ रह हैं लेकिन अगर कहीं हिन्दू हृदय सम्राट से बहुसंख्यकों का मोह भंग हो गया तो फिर उनके पास अपनी कुर्सी बचाए रखने का कोई दूसरा रास्ता नहीं होगा। इसीलिए योगी जी ने भी वही दांव खेला है जिसमें सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। जातियों में बंटे बहुसंख्यकों को एकजुट करने के लिए बीजेपी ताबड़तोड़ दांव चल रही है। अयोध्या में मंदिर बनना शुरू हो गया है तो काशी में भी विश्वनाथ कॉरिडोर अपनी भव्यता के साथ सामने आ रहा है। दावा तो गुंडागर्दी और अपराधों की रोकथाम का भी किया जा रहा है लेकिन इन सब पूरी तरह ना तो बीजेपी को भरोसा है और ना योगी जी को। यहाँ तक कि आरएसएस भी अभी तक पुख्ता तौर पर ये नहीं कह पा रहा है कि केवल मंदिर मुद्दे और कानून व्यवस्था के दावों से फिर से सरकार बन पाएगी या नहीं। इसीलिए अब चुनाव से पहले जनसंख्या नीति का पासा फेंका गया है। इस तीर के निशाने पर लगने की अच्छी संभावना है और अगर सब कुछ सही सही रहा तो योगी जी फिर से सरकार बनाने से कोई नहीं रोक सकता।

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