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कारगिल युद्ध से दिलीप कुमार का क्या कनेक्शन था?

मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार नहीं रहे

दिलीप साहब नहीं रहे, जब सबसे बड़े साहब का बुलावा आता है तो सभी को जाना ही पड़ता है और दिलीप साहब को भी दूसरी दुनिया के सफर पर जाना पड़ा। लेकिन 98 साल की अपनी जिंदगानी में दिलीप साहब अपने पीछे दर्जनों ऐसी कहानियाँ छोड़ गए जो बरसों बरस तक सुनी सुनाई जाएँगी।

पाकिस्तान के पेशावर से हिन्दुस्तान के मुंबई तक उनको चाहने वालों की संख्या करोड़ों में है। पेशावर के पठानों का वो लड़का आजादी से पहले ही पूरे हिन्दुस्तान में ऐसे छा गया कि सन 1947 में न उन्हें वापस अपने घर जाने का मन हुआ और न मुंबई की आबोहवा ने उन्हें यहाँ से जाने ही दिया।

दिलीप साहब के ऊँचे कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत में उन्हें जहाँ दर्जनों अवॉर्ड से नवाजा गया वहीं पाकिस्तान ने उन्हें अपना सबसे बड़ा सम्मान निशाने पाकिस्तान दिया। लेकिन दिलीप साहब दिल से सोलह आने सच्चे हिन्दुस्तानी थे, पाकिस्तान से मेलजोल बढ़ाने के तो हिमायती थे लेकिन पाकिस्तान की आतंकी हरकतों और घुसपैठों पर बुरी तरह भड़क उठते थे।

एक वाकया ने तो पूरे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में सुर्खियाँ बटोरीं थीं। हुआ ये कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर बस यात्रा करके दिल्ली वापस लौटे ही थे कि कुछ ही दिन बाद पता चला कि पाकिस्तान ने चोरी छिपे कारगिल की पहाड़ियों कब्जा कर लिया है और वहाँ पर मुजाहिदीनों के भेष में अपने सैनिक बिठा दिये हैं। पाकिस्तान की इस करतूत को भारत में पीठ में छुरा घोंपने की तरह से लिया गया। भारतीय सेना ने मोर्चा संभाल लिया लेकिन दिलीप साहब को पाकिस्तान की ये हरकत इतना खल गई कि उन्होंने पाकिस्तान के तब के पीएम नवाज शरीफ को फोन ही घुमा दिया और कहा कि “मियाँ साहब, ये आपने क्या किया। लाहौर में दिखावे की मेहमाननवाजी की और पीछे से कारगिल में घुस आए”। दिलीप साहब ने नवाज शरीफ को जमकर खरीखोटी सुनाई। सुना है कि नवाज शरीफ पूरा दोष पाकिस्तान की सेना पर ही डालते रहे कि तब के आर्मी चीफ जनरल मुशर्रफ ने बिना देश को भरोसे में लिए ही पाकिस्तानी सेना को कारगिल में घुसने के आदेश दिए थे। हालांकि बाद में भारतीय फौजियों ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को निकालकर बाहर किया लेकिन दिलीप साहब के उस फोन से हिन्दुस्तानियों के दिल में उनकी इज्जत और भी बढ़ गई।

आज के कम ही लोगों को पता होगा कि दिलीप कुमार का असली नाम यूसुफ खान था लेकिन मुंबई में हीरो बनने के लिए उन्होंने अपना फिल्मी नाम बदलकर दिलीप कुमार कर लिया था। दिलीप साहब की ऐक्टिंग दीवानगी इतनी बढ़ी कि उनके बाद बॉलीवुड में जितने भी ऐक्टर आए सभी पर दिलीप साहब की कॉपी करने के आरोप लगा।

वैसे तो आज की जवान पीढ़ी उनकी नई फिल्मों के इंतजार की बेसब्री से मरहूम ही रह गई लेकिन उनके दादा, दादी और परदादा ने अपने जमाने में दिलीप साहब का जो क्रेज देखा होगा उसके सामने आज के सलमान और रणवीर सिंह कहीं भी नहीं टिकते। दिलीप साहब हर दिल अजीज थे। बढ़ती उम्र और तबियत बिगड़ने के वजह से वो पिछले 20-25 साल से भले ही फिल्मों से दूर हो गए थे लेकिन हिन्दुस्तानी फिल्मों का हर दीवाना उनकी कम से कम एक झलक पाने को मचलता रहता था।

ट्रैजेडी किंग के नाम से मशहूर रहे दिलीप साहब का जाना भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए एक बहुत बड़ी ट्रैजेडी ही साबित होगी।

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